राजनीति या स्वार्थनीति: — डॉ. विनय कुमार

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IEP Dehradun

राज का अर्थ है शासन, नीति का अर्थ है विचार या पद्धति अर्थात राजनीति का अर्थ हुआ – वह पद्धति , जिसके अनुसार किसी भी  राज्य या राष्ट्र का शासन सुचारू और सुव्यवस्थित रूप से संचालित हो सके. दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि इसके अन्तर्गत वे सभी योजनाऐं आती हैं जो आम जनता द्वारा व्यावहारिक रूप से अपनाई जा सके और व्यावहारिक रूप से जनता वैसी ही योजनओं से लाभान्वित होंगी जो किसी विचार, सिद्धान्त, नीति या पद्धति की कसौटी पर निर्विवाद रूप से खरे उतरें.

इस दृष्टिकोण से यदि आज हम बिचार करें तो पाते हैं कि  कोई भी संगठन, पार्टी, समूह आज व्यापक हित में न तो कोई योजनाऐं बना पा रही हैं और न ही उस  व्यक्ति विशेष, समूह ,पार्टी या संगठन की सोच से ऊपर उठकर बिचार ही कर पा रही हैं. हर पार्टी, हर संगठन सिर्फ अपने ही पार्टी और संगठन के पारम्परिक कचड़ा  को ढो-ढोकर राजनीति जैसे पवित्र धर्म को बदनाम कर रहे हैं.  इसे हम राजनीति न कहकर स्वार्थनीति कहें तो शायद  गलत नहीं होगा.

कोई भी क्षेत्र ले लें — सरकार तटत्थ होकर  सिद्धान्त के आधार पर निर्णय लेने में असक्षम हैं. यही कारण है कि जहाँ एक ओर वेरोजगारों की भीड़ खड़ी हो रही है वहीं दूसरी ओर आतंकबादियों का समूह , जहाँ एक ओर जनता के पैसे को लूटकर अट्टालिकाऐं बन रहीं हैं वहीं दूसरी ओर जल, जीवन और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत आवश्यकताऐं भी इन्सान को मयस्सर नहीं हो पा रही हैं.

आज देश की सुरक्षा के नाम पर जनता द्वारा चयनित प्रतिनिधि मात्र अपनी ही सुरक्षा में अपने कर्तव्य की इतिश्री समझते हैं. कैसी बिडम्बना है कि जो व्यक्ति घर-घर जाकर  स्त्री- पुरूष, बच्चे-बूढ़े से हाथ जोड़कर मतदान की भीख माँगते हैं, वही सत्ता में आते ही इतने बदल जाते हैं कि उसी जनता के बीच अकेले जाने का वे साहस नहीं जुटा पाते, हर क्षण संतरियों की सुरक्षा में गौरवान्वित महशूश करते हैं. और जो जनता के बीच अकेले जाने का साहस नहीं जुटा पाते वे देश की सुरक्षा हेतु कठोर कदम उठाने का साहस कैसे कर सकते हैं ?

इतना ही नहीं,  देश की सेवा का ब्रत लेनेवाले आज जनता का शोषक बना बैठा है. इतनी सुविधाऐं, इतने भत्ते आम जनता उन देशभक्तों को मात्र इसलिए तो नहीं देते हैं कि उनकी सुख- सुविधाओं को छीनकर आप ऐशो-आराम की जिन्दगी जिऐं. सरकारी विद्यालय, सरकारी अस्पताल, सरकारी कार्यालय और सरकारी सुरक्षा ऐजेन्सियाँ ——- ये सब देश के विकास का आईना होता है.  इन जगहों पर जाकर महशूश किया जा सकता है कि विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र किस तरह आज सिमटकर एक समूह तंत्र – सा दिखने लगा है , जो प्रकारान्तर से अराजकतंत्र  का हिस्सामात्र लगता है.

तीस बर्षों की कठिन साधना करनेवाला कर्मचारी, वे सरहदी वीर जिनकी सम्पूर्ण जवानी अधुनातन मिशाईलों की गड़गड़ाहट और देश के सीमा की सुरक्षा में बीतता है— अवकाशोपरान्त पेंशन के अभाव में  जहाँ दाने- दाने को मुँहताज होते  हैं, वहीं एक दिन के लिए  भी  विधायक, सांसद का पद सुशोभित करनेवाले भाग्यवान  ताउम्र पेंशन के अधिकारी —- क्या लोकतंत्र की यही परिभाषा  है ? यदि हाँ तो मैं इसे निरंकुश राजतंत्र कहना लाजिमी समझता हूँ.

निसंन्देह, आज की राजनीति राजनीति नहीं स्वार्थनीति है, जो जनता को झांसा दे –देकर एक वर्गविशेष के हाथों सारी सत्ता  समाहित करनेवाली छद्मनीति है जिसका निराकरण युग की माँग बनती जा रही है. इसके लिए हर व्यक्ति को पूरी सतर्कता के साथ एकजुट होकर आगे आना होगा. उन्हें धर्म, जाति, सम्प्रदाय, स्थान, भाषा के दल-दल से ऊपर उठकर एक सिद्धान्त आधारित संकल्पों के साथ जीने और मरने का प्रण लेना होगा,  जहाँ  ‘ स्व ‘  की जगह  ‘ पर के लिए संघर्ष ‘   का दर्शन अपनाना होगा.

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द्वारा —   डॉ.  विनय कुमार

उप – प्राचार्य

जवाहर नवोदय विद्यालय, कोडरमा, झारखंड.

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